भोपाल में प्रदेश के जलवायु परिवर्तन कार्य योजना पर राज्य स्तर का जन परामर्श,


बीरबलभूमि समाचार सीधी। मध्यप्रदेश जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना पर राज्य स्तरीय जन परामर्श 28–29 दिसंबर को आईकफ आश्रम, भोपाल में संपन्न हुआ। इस दो दिवसीय कार्यक्रम में प्रदेश के विभिन्न जिलों सतना, रीवा, मंडला, सिवनी, जबलपुर, सीधी, डिंडोरी, खरगोन, इंदौर, खंडवा, हरदा, सीहोर, बैतूल, रायसेन और भोपाल से लगभग 50 प्रतिभागियों ने भाग लिया। संवाद में दलित, आदिवासी, घुमंतु समुदाय, किसान संगठन, मछुआरे, कुम्हार, पशुपालक, असंगठित मजदूर, घरेलू कामगार, निर्माण श्रमिक, महिला समूह, युवा, बीज बैंक, दिव्यांग संगठन, एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता, पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वास्थ्य विशेषज्ञ सहित विविध समुदायों और संस्थाओं ने अपनी भागीदारी दर्ज की। नागरिक समाज संस्थाओं और प्रमुख संगठनों में भू अधिकार अभियान, बरगी मत्स्य संघ, बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ, नागरिक अधिकार मंच, रेवांचल दलित आदिवासी सेवा संस्थान, मध्यप्रदेश विज्ञान सभा, किसान जागृति संगठन, रोको टोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा, प्रगति दिव्यांग सेवा समिति और सर्व आदिवासी समाज कल्याण संगठन शामिल रहे। इस जन परामर्श का आयोजन उन्नति इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट, भोपाल द्वारा किया गया। कार्यक्रम के उद्देश्य पर आधार वक्तव्य देते हुए उन्नति संस्था, भोपाल से राजेश कुमार ने योजना का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत किया। इस दो दिवसीय जन परामर्श में जलवायु परिवर्तन से जुड़े आठ विभिन्न विषयों पर पैनल चर्चाएँ आयोजित की गईं और सुझाव प्रस्तुत किए गए। प्रथम सत्र भारत और मध्यप्रदेश में बढ़ता जलवायु संकट विषय पर केंद्रित था। सत्र की अध्यक्षता करते हुए रोको टोको ठोको क्रांतिकारी मोर्चा, सीधी के उमेश तिवारी ने कहा कि जलवायु संकट की नीतियों के निर्माण में वंचित समुदायों की उपेक्षा कर समस्या का समाधान संभव नहीं है। उनके मुद्दों को संबोधित करना अनिवार्य है। मोगली पलटन समूह, सीधी ने बताया कि जलवायु परिवर्तन और सोन नदी में पानी की कमी के कारण घड़ियाल संरक्षण पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। घुमंतु समुदाय से आई रूपरानी दीदी ने साझा किया कि उनका समुदाय पूरी तरह प्रकृति और जंगल पर निर्भर था, किंतु जैसे-जैसे जंगल नष्ट होते गए, उन्हें मजबूरन शहरों की ओर पलायन करना पड़ा, जहाँ आजीविका के अभाव में उन्हें कूड़ा बीनने का कार्य करना पड़ रहा है। कुम्हार समुदाय से आए जितेन्द्र ने कहा कि मशीनीकरण और संसाधनों की कमी के चलते यह समुदाय धीरे-धीरे अपने पारंपरिक कार्यों से दूर होता जा रहा है और अन्य आजीविकाओं की ओर बढ़ रहा है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से पानी और मिट्टी की अनिश्चितता ने उनकी पारंपरिक आजीविका को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक लोग रोजगार विहीन हो गए हैं। ये सभी समुदाय सीधे जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं और हाशिये पर खड़े समूह हैं। भू अधिकार अभियान, जबलपुर से आए राहुल ने अपने वक्तव्य में कहा कि राज्य की जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा पंचायती राज (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम, 1996 को रेखांकित नहीं करती है, जबकि ये दोनों अधिनियम आदिवासी समुदायों के वन संसाधनों पर अधिकारों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
