पराली न जलाएं, जैविक खाद अपनाएं-कृषि वैज्ञानिकों की सलाह,
बीरबलभूमि समाचार सीधी। कृषि विज्ञान केन्द्र, सीधी के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. शैलेन्द्र सिंह गौतम ने कृषकों को समसामयिक सलाह देते हुए कहा है कि खेतों में पराली जलाने से बचें। पराली जलाने से मृदा में मौजूद लाभदायक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं, पर्यावरण प्रदूषित होता है तथा भूमि की संरचना कठोर हो जाती है। इससे जल धारण क्षमता घटती है और वातावरण का तापमान भी बढ़ता है। उन्होंने बताया कि फसल अवशेषों को खेत में सड़ने देने से भूमि प्राकृतिक रूप से अधिक उपजाऊ बनती है। पराली को जलाने के बजाय नाडेप पिट या वर्मी कम्पोस्ट के माध्यम से जैविक खाद तैयार करना अधिक लाभकारी है। इससे मृदा में कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ती है और उत्पादन में वृद्धि होती है। दलहनी फसलों के अवशेषों को जमीन में मिलाने से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है, वहीं बायो-डाइजेस्टर का उपयोग भी जैविक खाद निर्माण में किया जा सकता है। वैज्ञानिकों ने वर्तमान मौसम को देखते हुए मूंग की फसल के लिए भी सलाह दी है। फसल में पीला रोग दिखाई देने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल की 8 मिली मात्रा प्रति 15 लीटर पानी या थायोमेथोक्साम एवं इमिडाक्लोप्रिड की मिश्रित दवा 10 मिली प्रति 15 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। कृषि विज्ञान केन्द्र ने किसानों से अपील की है कि वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर मृदा की उर्वरता बनाए रखें और उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कदम उठाएं।
